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एम्स के अदालती मामलों की सुनवाई में रुकेगी फिजूलखर्ची

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नई दिल्ली । विभिन्न अदालतों में लंबित एम्स से संबंधित मामलों की सुनवाई पर होने वाली फिजूलखर्ची पर रोक लगाने के लिए एम्स प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए 14 वकीलों का एक पैनल गठित किया है। एम्स ने साढ़े तीन साल पहले पैनल गठित करने की पहल की थी लेकिन संस्थान के अधिकारियों व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की अनदेखी से पैनल का गठन नहीं हो पा रहा था। अब जाकर एम्स प्रबंधन ने अदालती मामलों की सुनवाई में अधिक शुल्क भुगतान के विवाद में फंसे वकील को संस्थान से हटाया है। साथ ही एक-दो वकील रखने की जगह एक पैनल गठित कर दिया है। इस पैनल में शामिल वकील अदालतों में लंबित मामलों पर एम्स का पक्ष प्रस्तुत करेंगे।

उल्लेखनीय है कि एम्स में चिकित्सकीय लापरवाही से लेकर कर्मचारियों की नियुक्ति व पदोन्नति से जुड़े सैकड़ों मामले हर साल अदालतों में लंबित होते है। उन मामलों की सुनवाई के लिए पहले वकीलों का कोई पैनल नहीं था। बल्कि संस्थान की ओर से एक-दो वकील नियुक्त किए गए थे। इसमें से एक वरिष्ठ वकील ही 80 फीसद मामलों की पैरवी के लिए एम्स की तरफ से अदालतों में पेश होते थे, जिनके शुल्क भुगतान पर विवाद भी हुआ। इससे एम्स प्रबंधन पर भी सवाल उठा। क्योंकि वकीलों का पैनल नहीं होने के कारण मामलों की सुनवाई के लिए संस्थान में नियुक्त वकीलों को सरकार द्वारा तय शुल्क से तीन से चार गुना अधिक भुगतान किया गया।

एम्स ने जून 2014 में 10 वकीलों का पैनल गठित कर इसकी स्वीकृति के लिए फाइल केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के पास भेजी थी। इस पहल में संस्थान के तात्कालिक उप सचिव संजीव चतुर्वेदी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उस वक्त मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी और फाइल वापस एम्स को लौटा दी गई। इसके बाद एम्स ने अगस्त 2014 में दोबारा फाइल मंत्रालय के पास भेजी। तब यह बात सामने आई थी कि वर्ष 2004-05 से लेकर 2012-13 तक एम्स ने वकीलों की फीस पर 3.23 करोड़ रुपये खर्च किए। जिसमें 1.04 करोड़ रुपये सिर्फ वर्ष 2012-13 में खर्च किये गये। वकीलों की फीस पर इस भारी भरकम खर्च को रोकने के लिए ही पैनल गठित करने की जरूरत महसूस हो रही थी। पैनल में शामिल वकीलों को एम्स केंद्रीय कानून मंत्रालय द्वारा निर्धारित शुल्क के मुताबिक फीस भुगतान करेगा।

By Jagran 

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