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राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग बिल का आइएमए ने किया विरोध

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नई दिल्ली। देश में मेडिकल शिक्षा व चिकित्सा को संचालित करने वाली भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) को भंग कर उसकी जगह राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के गठन का फैसला डॉक्टरों को रास नहीं आ रहा है। डॉक्टरों के सबसे बड़े संगठन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग बिल का विरोध किया है। एसोसिएशन को यह डर है कि आयोग के गठन होने से आयुष के डॉक्टरों को भी एलोपैथिक दवाएं लिखने का अधिकार मिल सकता है। साथ ही नौकरशाही भी बढ़ेगी।

एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आयोग के गठन के फैसले पर विचार करने की मांग की है। एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल ने कहा कि आयोग गठन के प्रस्ताव में यह कहा गया है कि सभी मेडिकल कॉलेजों के छात्रों को एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद संयुक्त एग्जिट परीक्षा देनी होगी। यह प्रावधान ठीक नहीं है। यदि एग्जिट परीक्षा का प्रावधान रखा जाता है तो इसका मतलब है कि सरकार ने जिन मेडिकल कॉलेजों को मान्यता दी है उनकी गुणवत्ता पर उसे खुद विश्वास नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा एमसीआइ में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। सरकारी क्षेत्र के अलावा निजी क्षेत्र के डॉक्टरों की भी भागीदारी है। एमसीआइ का गठन चुनाव के माध्यम से होता है जबकि आयोग का गठन होने पर एसोसिएशन को डर है कि सरकार से नियुक्त अधिकारी ही शामिल होंगे इसलिए निजी क्षेत्र के डॉक्टरों की भागीदारी खत्म हो जाएगी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग बिल के मसौदे में ऐसा प्रस्ताव है कि यदि आयोग चाहे तो एमबीबीएस के अलावा दूसरे कोर्स को भी मान्यता दे सकता है। ऐसे में आयुष के डॉक्टरों को एलोपैथिक दवाएं लिखने का अधिकार मिल सकता है जबकि एमसीआइ के प्रावधानों के अनुसार एमबीबीएस डॉक्टर के अलावा किसी और चिकित्सा पद्धति के डॉक्टर एलोपैथिक दवाएं नहीं लिखे सकते हैं। एसोसिएशन का कहना है कि डॉक्टरों को मरीज का इलाज तय करने का पूरा अधिकार होना चाहिए।

rom Dainik Jagran

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