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कोरोना महामारी और संकट: आखिर पटरी पर कब लौटेगी जिंदगी

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लॉकडाउन लगाए जाने के बाद जिस तरह से लाखों की संख्या में मजदूर और कामगार अपने गांंवो की तरफ रिवर्स पलायन पर निकल पड़े उसकी मिसाल आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास में देखने को नहीं मिलती है। यह एक ऐसा वर्ग है जिसपर लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार पड़ी है वे अपने देश में ही प्रवासी करार दिए गए। 
एक ऐसे समय में जब सबसे ज्यादा मदद की जरूरत थी तो उन्हें पूरी तरह से लावारिस छोड़ दिया गया जबकि इस देश के चुनावी राजनीति को चलाने वाले वही सबसे बड़े ईधन हैं। इस दौरान केंद्र और राज्य सरकारों का रवैया ऐसा रहा मानोंं इनका कोई वजूद ही ना हो। जब वे भूखे, प्यासे, बदहवासी के आलम में सैकड़ों, हजारों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल ही निकल पड़े तब भी इस व्यवस्था का दिल नहीं पसीजा और उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज करते उनके हाल पर 
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