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एम्स में सर्जिकल उपकरणों की खरीद में घपले का सीबीआइ ने दर्ज किया मुकदमा

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नई दिल्ली । एम्स के सर्जरी विभाग में उपकरणों व अन्य सामानों की खरीद में हुए घपले में सीबीआइ ने आखिरकार साढ़े तीन साल बाद मुकदमा दर्ज कर लिया है। मुकदमा दर्ज करने से पहले सीबीआइ ने इस मामले की अपने स्तर पर जांच की, इसके बाद घपले के लिए साजिश रचने, जालसाजी व भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है। इसमें मेसर्स एचएस इंटरप्राइजेज के प्रतिनिधि जगमोहन ऋषि, कंपनी के मालिक, एम्स के कलर्क नरेश कुमार व अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है। अज्ञात लोगों को आरोपी बनाए जाने से एम्स के कई डॉक्टरों की परेशानी बढ़ सकती है। सीबीआइ जांच में यह बात सामने आई है कि एम्स कर्मचारियों की मिलीभगत से इस कंपनी ने फर्जी तरीके से तीन अन्य कंपनियों के लेटरहैड का इस्तेमाल कर संस्थान को 24.17 लाख रुपये का चुना लगाया है।

सीबीआइ द्वारा दर्ज मुकदमे के अनुसार सर्जरी विभाग ने वर्ष 2013-14 में सर्जिकल उपकरणों व अन्य सामानों की खरीद के लिए 27 ऑर्डर कर रेट एंक्वायरी (आरई) की थी। मेसर्स एचएस इंटरप्राइजेज ने इनमें से 17 सामान की आपूर्ति करने का कोटेशन भेजा। साथ ही इस कंपनी के प्रतिनिधि जगमोहन ऋषि ने गलत तरीके से तीन अन्य कंपनियों के लेटरहैड का इस्तेमाल कर उनके नाम पर भी कोटेशन भर दिया, जबकि इन तीनों कंपनियों ने कोई कोटेशन नहीं भरा था। इस तरह मेसर्स एचएस इंटरप्राइजेज ने 27 में से 17 टेंडर खुद पा लिए। सीबीआइ ने 9 अगस्त 2017 को प्राथमिक जांच रिपोर्ट पर पड़ताल शुरू की तो पता चला कि एम्स ने सामानों की खरीद के लिए कोई सार्वजनिक टेंडर जारी नहीं किया था। उसने दो लाख से कम रकम वाले 27 छोटे टेंडर जारी किए थे, जिसे तकनीकी भाषा में आरई कहा जाता है। ऐसी सूरत में पंजीकृत कंपनियों को स्पीड पोस्ट, रजिस्ट्री, कुरियर या ईमेल के जरिये खरीद प्रक्रिया की सूचना दी जाती है। हैरानी की बात यह है कि जिन तीन कंपनियों के लेटरहैड इस्तेमाल किए गए थे उनको एम्स की तरफ से कोई पत्र प्राप्त नहीं हुआ था। सर्जरी विभाग ने नियमों का पूरा पालन नहीं किया, ताकि किसी खास कंपनी को फायदा पहुंचाया जा सके। सीबीआइ ने जांच में पाया कि सर्जरी विभाग के तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ. एमसी मिश्रा ने तब एक टेंडर कमेटी भी गठित की थी, लेकिन सर्जिकल विभाग के स्टोर में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि अन्य कंपनियों को टेंडर प्रक्रिया की जानकारी भेजी गई थी। इसके अलावा किसी भी विभाग में सामान व उपकरणों की खरीद के लिए विभागीय डॉक्टरों से (फैकल्टी) पहले डिमांड पत्र मांगा जाता है। सीबीआइ को डॉक्टरों का कोई डिमांड पत्र भी हाथ नहीं लगा। वर्ष 2014 में एम्स के तत्कालीन मुख्य सतर्कता अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने सर्जरी विभाग में सामानों की खरीद में भ्रष्टाचार को उजागर किया था। तब एम्स में जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की गई थी। एम्स में 67 लाख रुपये के ऐसे सर्जिकल उपकरण व सामान बरामद किए थे जो बेकार हो चुके थे। इनमें इस मामले से जुड़े उपकरण व सामान भी शामिल थे।

from Dainik Jagran

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